धान को रोग, कीटों से बचाने का है ये रामबाण उपाय…

किसान महंगे बीज, खाद इस्तेमाल कर धान की खेती करता है, ऐसे में सही प्रबंधन न होने से कीट और रोगों से काफी नुकसान उठाना पड़ता है। इसलिए सही समय से ही इनका प्रबंधन कर नुकसान से बचा जा सकता है। धान की फसल को विभिन्न क्षतिकर कीटों जैसे तना छेदक, गुलाबी तना छेदक, पत्ती लपेटक, दीमक, धान का फुदका और गंधीबग कीटों से नुकसान पहुंचता है।

धान का तना छेदक: इस कीट की सूड़ी अवस्था ही क्षतिकर होती है. सर्व प्रथम अंडे से निकलने के बाद सूड़ियॉ मध्य कलिकाओं की पत्तियों में छेदकर अन्दर घुस जाती है तथा अन्दर ही अन्दर तने को खाती हुई गांठ तक चली जाती हैं. पौधों की बढ़वार की अवस्था में प्रकोप होने पर बालियाँ नहीं निकलती है. बाली वाली अवस्था में प्रकोप होने पर बालियाँ सूखकर सफ़ेद हो जाती हैं तथा दाने नहीं बनते हैं.

गुलाबी तना बेधक: यह मुख्यतया झंगोरा, मडुवा, कौणी की फसल को क्षति पहुंचाता है. परन्तु पर्वतीय क्षेत्रों में असिंचित धान में इस कीट का प्रकोप धान के तना बेधक की अपेक्षा अधिक पाया गया है. इस कीट के बचाव हेतु उपरोक्त में तना बेधक कीट के बचाव हेतु बताये गए उपायों को अपनायें.

धान का पत्ती लपेटक कीट: मादा कीट धान की पत्तियों के शिराओं के पास समूह में अंडे देती हैं. इन अण्डों से ६-८ दिन में सूड़ियां बहार निकलती है. ये सूड़ियां पहले मुलायम पत्तियों को खाती हैं तथा बाद में अपने लार द्वारा रेशमी धागा बनाकर पत्ती को किनारों से मोड़ देती है और अन्दर ही अन्दर खुरच कर खाती है. इस कीट का प्रकोप अगस्त-सितम्बर माह में अधिक होता है. प्रभावित खेत में धान की पत्तियां सफ़ेद एवं झुलसी हुई दिखायी देती हैं.

धान की गंधीबग: वयस्क लम्बा, पतले व् हरे-भूरे रंग का उड़ने वाला कीट होता है. इस कीट की पहचान किसान भाई कीट से आने वाली दुर्गन्ध से भी कर सकते हैं. इसके व्यस्क एवं शिशु दूधिया दानों को चूसकर हानि पहुंचाते हैं जिससे दानों पर भूरे रंग के धब्बे बन जाते हैं तथा दाने खोखले रह जाते हैं.

कुरमुला कीट: असिंचित धान में कुरमुला कीट का प्रकोप पर्वतीय क्षेत्रों में जुलाई- अगस्त माह में अधिक दिखायी देता है. सिंचित धान में इस कीट का प्रकोप नहीं होता है. प्रथम अवस्था वाले ग्रब जून-जुलाई माह में पौधों की जड़ों को खाना शुरू कर देतें है. ये ग्रब अगस्त-सितम्बर तक द्वितीय एवं तृतीय अवस्था में आ जाते हैं तथा जड़ों को पूरी तरह काटकर खा जाते हैं, जिससे पौधे मुरझा कर पीले पड़ जाते हैं तथा बाद में सूख जाते हैं. क्षतिग्रस्त पौधों को हाथ से पकड़कर खींचने पर पौधे जमीन से उखड़ जाते हैं. इस कीट द्वारा धान की फसल को लगभग २०-८० प्रतिशत तक क्षति हो जाती है.

कीट प्रबंधन: धान की फसल में कीटों की रोकथाम के लिए आपको डेनिटोल के कम से कम 3 छिड़काव करने होंगे, आइये जानते है की ये छिड़काव आपको कब और कितनी मात्रा में करने है। धान की बुआई के 40 से 45 दिन में आपको 15 लीटर पानी में 40 मिली डेनिटोल लेकर उसका छिड़काव आपको अपनी धान की फसल पर पहला छिड़काव करना है। इस पहले छिड़काव के बाद आपको डेनिटोल का दूसरा छिड़काव पहले छिड़काव के 13 से 15 दिन के बाद करना है। इस छिड़काव की मात्रा भी 40 मिली प्रति 15 लीटर पानी में ही रहेगी। तीसरा छिड़काव आपको दूसरे छिड़काव के 15 दिन बाद करना है इस छिड़काव की मात्रा भी 40 मिली प्रति 15 लीटर पानी में ही रहेगी।

प्रमुख रोगों से बचाव:

झोंका (ब्लास्ट) रोग: असिंचित धान में इस रोग का प्रकोप बहुत अधिक होता है. इस रोग का प्रकोप होने पर पत्तियों, गाठों, बालियों पर आँख की आकृति के धब्बे बनते हैं जो बीच में राख के रंग के तथा किनारे गहरे भूरे रंग के होते हैं. तनों की गाठ पूर्णतया या उसका कुछ भाग काला पड़ जाता है और वह सिकुड़ जाता है, जिससे पौधा सिकुड़ कर गिर जाता है. इस रोग का प्रकोप जुलाई- सितम्बर माह में अधिक होता है.

भूरी चित्ती रोग: इस रोग के लक्षण मुख्यतया पत्तियों पर तथा पर्णच्‍छदों पर छोटे- छोटे भूरे रंग के धब्बे के रूप में दिखायी देतें है. उग्र संक्रमण होने पर ये धब्बे आपस में मिल कर पत्तियों को सूखा देते हैं और बालियाँ पूर्ण रूप से बाहर नहीं निकलती हैं. इस रोग का प्रकोप उपराउ धान में कम उर्वरता वाले क्षेत्रों में अधिक दिखायी देता है.

पर्णच्‍छद अंगमारी (शीथ ब्लाइट): इस रोग के लक्षण मुख्यत: पत्तियों एवं पर्णच्‍छदों पर दिखायी देतें है. पर्णच्‍छद पर पत्ती की सतह के ऊपर २-३ से.मी. लम्बे हरे-भूरे या पुआल के रंग के क्षत स्थल बन जाते हैं.

आभासी कंड: यह एक फॅफूंदीजनित रोग है. रोग के लक्षण पौधों में बालियों के निकलने के बाद ही स्पष्ट होतें है. रोग ग्रस्त दाने पीले से लेकर संतरे के रंग के हो जाते हैं जो बाद में जैतूनी- काले रंग के गोलों में बदल जाते हैं. इस रोग का प्रकोप अगस्त- सितम्बर माह में अधिक दिखायी देता है.

खैरा रोग: यह रोग मिट्‍टी में जिंक की कमी के कारण होता है. इस रोग के लक्षण पत्तियों पर पहले हल्के रंग के धब्बे जो बाद में कत्थई रंग के हो जाते हैं के रूप में दिखायी देतें है.

रोग प्रबंध: धान की फसल में रोगों की रोकथाम के लिए आपको डेनिटोल के कम से कम 3 छिड़काव करने होंगे, आइये जानते है की ये छिड़काव आपको कब और कितनी मात्रा में करने है। धान की बुआई के 40 से 45 दिन में आपको 15 लीटर पानी में 40 मिली डेनिटोल लेकर उसका छिड़काव आपको अपनी धान की फसल पर पहला छिड़काव करना है। इस पहले छिड़काव के बाद आपको डेनिटोल का दूसरा छिड़काव पहले छिड़काव के 13 से 15 दिन के बाद करना है। इस छिड़काव की मात्रा भी 40 मिली प्रति 15 लीटर पानी में ही रहेगी। तीसरा छिड़काव आपको दूसरे छिड़काव के 15 दिन बाद करना है इस छिड़काव की मात्रा भी 40 मिली प्रति 15 लीटर पानी में ही रहेगी।

डेनिटोल इस्तेमाल करने के फायदे : भारत के कई प्रदेशो में किसानो ने डेनिटोल का इस्तेमाल करके धान की फसल में रोगों और कीटों से 100 प्रतिशत छुटकारा पाया है ज्यादा जानकारी के लिए हमारी वेबसाइट www.paddyricepest.com देखे और निचे दिए गए वीडियो को अच्छी तरह से देखे।

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